11 फ़रवरी 2015

क्या हो तुम

अधरों पर छनकते स्वरों की लय,
हो तुम।

आँखों में बसे स्नेहिल स्वपन,
हो तुम।

निहारे जिसे  दर्पण एक टक वह मूरत ,
हो तुम। 

आकाश में उड़ती भावनाओं की डोर ,
हो तुम।

सुदूर दिशाओं में गूंजता पर्वतीय गीत ,
हो तुम।

मन में छिपी रहस्यमयी प्रीत ,
हो तुम।

लहरों पर उमड़ता सूर्य प्रकाश ,
हो तुम।

अचल , समूर्ण प्रशांत ,
हो तुम।

शांत हो ,
एकांत हो।

क्या व्याख्यान करूँ ,
क्या वर्णन करूँ ,
सरल हो ,
अविरल हो ,
फिर भी एक पहेली।

कभी भी शायद तुम्हें बता न सकूँ ,
कि मेरे लिए क्या हो तुम...............

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आभार है मेरा