29 December 2014

कुछ याद आता है

जब भी इन गलियारों से गुजरती हूँ ,
कुछ याद आता है। 
वह बातें , वह रूठना - मानना ,
और फिर कुछ बना बहाना ,
तुम्हारा मुझे रिझाना। 


उस बागीचे के कोने को देख ,
कुछ याद आता है। 
फूल जैसे पूछ रहे हों तुम्हारा पता ,
तुम्हारी यादें ज्यूँ वृक्षों पर लिपटी लता ,
कहें मुझसे कुछ तो हमें बता। 


मधुर गीत कोई गुनगुनाये ,
कुछ याद आता है। 
तुम्हारे शब्दों की लड़ी ,
वक्त की रुकती-थमती घड़ी ,
जिसकी तुमसे जुड़ी है कड़ी। 


देखूं जब बादलों को उड़ते ,
कुछ याद आता है। 
तुम्हारा दर्द ओर कराहना ,
कभी रोना और चहचहाना ,
उम्मीद है स्मरण रखोगे बिताये पल, जब भी तुम इस और आना। 


यूँ ही बस कुछ याद आता  है........................... 














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आभार है मेरा

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