12 सितंबर 2014

कौन हूँ मैं ?

तुम्हारे पथ पर पड़ी ,
चरण-धुली हूँ ,
छू कर तुम्हें पवित्र हो गई हूँ। 

फिर भी पूँछू खुद से ----- आखिर कौन हूँ मैं ?

जीवन के पन्नों पर लिखी एक कविता हूँ ,
जो ऐसी स्याही से लिखी गयी ,
कि कुछ बारिश की बूंदे बहा ले जाएं। 

फिर सोचती हूँ  ----- आखिर कौन हूँ मैं ?

कई जन्मों से तुम्हारे इंतज़ार में बैठी,
मन में स्नेह संजोये , 
अनगिनत ख्वाबों में खोये। 
यही सोचूं ----- आखिर कौन हूँ मैं ?

कभी धारा समान  प्रवाहित थी,
कोलाहल से सुसज्जित ,
वर्तमान  में  निर्जला  । 
तो ----- आखिर कौन हूँ मैं ?
   
अनकहे गीत की तरह हवा में बहती हूँ ,
बरसों पहले जो हकीकत थी ,
अब भूली - बिसरी स्मृति हूँ। 

आखिर कौन हूँ मैं ?



1 टिप्पणी:

  1. कविता ने मन को बाँध लिया .. क्या खूब लिखा है .. अंतिम पंक्तियों ने जादू कर दिया है ,,..

    Recent Post शब्दों की मुस्कराहट पर कुछ रिश्ते अनाम होते है :)

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आभार है मेरा