30 June 2014

इन्सान

क्या  दौड़ना ही  इन्सान के  जीवन का  ध्येय है ?
इसी भागदौड़ में जीवन व्यय है। 

कभी सोचे कि रुके एक पल को,
लेकिन फिर देखे आँखों के समक्ष गुजरते  हुए अपने कल को। 

संघर्ष करे आखिर कब तक ?
शायद सपनों की उड़ान पूरी न हो जब  तक । 

हिम्मत क्षण - क्षण में जुटाये ,
दुःख हो या सुख ,फिर भी सुहाना राग गुनगुनाये। 

विपरीत परिस्थितियों में  मुस्कुराता है,
ह्रदय में बसे अपने भगवान को भी मानता है। 

छिन्न - भिन्न हो जाये यदि आत्मसम्मान,
तो उसे  फिर से शिखर तक  पहुंचाना जानता है। 



 भुजाओं में वज्र की  कठोरता ,
मन में स्नेह की कोमलता ,
कई विभिन्नताओं को समाये हुए है इंसान। 

पतझड़ में वसंत की उम्मीद,
सर्दियों में धूप  की  आस ,
ऐसी ही प्रेरणाओं  से  खुद को जगाये इंसान। 

हर विघ्न -  बाधा से लड़ता जाये ,
कभी न  थके ,
कभी न रुके ,
कभी न झुके,
जीवन पथ पर बढ़ता जाये इंसान। 






2 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. That is a wonderful poem. I didn't know you wrote in Hindi as well. It was only after I read your interview on PU that I visited this blog and read some of your poems in the mother tongue. Great job. :-)
    -HA

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आभार है मेरा

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