20 जून 2014

चिर निद्रा

देख लिया है  संसार सारा ,
है इच्छाओं की, पूर्ण धारा। 

ज्यों जल को चाहे है मीन,
त्यों ही होना चाहूँ मैं चिर निद्रा  में विलीन। 

भटकता है इन्सान जन्मों के चक्र में,
कभी है कर्क , कभी है मकर में। 

तोड़ दूँ  यह बंधन मोह का,
करूँ अभिनन्दन मोक्ष का। 

दुःख, सुख, भय  भावनाओं से  छूट कर ,
विलुप्त हो जाऊं ब्रह्माण्ड संग। 

एक अणु की शक्ति बन,
समग्र अर्थ सींच लूँ ,


चिर निद्रा के गर्भ में स्वयं को मैं  खींच लूँ। 







2 टिप्‍पणियां:

  1. Dear Vandana you have said it beautifully in poetry what i feel in sentences. Very well said indeed. Maybe i'll come back and should hear more of what u say...if this is so beautiful i wonder how many more i have missed.
    Thank you for stopping by at my post and leaving behind ur prints...thus leading me here. :) Felt nice ur page and you. :)

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  2. अंतिम सत्य तो यही है ... गहन भावयुक्त प्रस्तुति !!

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आभार है मेरा