13 June 2014

जिंदगी

धूप में ,छाओं में,
दौड़ती है,
जिंदगी।

कभी खुशियों का  गुलदस्ता लिए ,
कभी ग़मों का पुलिंदा लिए,
भटकती है,
जिंदगी। 

प्यासी आँखें  पीती हैं पानी, 
आसुओं की बौछार से ,
कहीं पेट  की आग  बुझाती,
चंद बातें ,
बस ऐसे ही सरपट- सरपट चलती है,
जिंदगी। 

शिकायत करे या बढ़ती जाये, 
सोचती रहती है,
जिंदगी। 
यहीं खिलखिलाती,
और मिट जाती है ,
जिंदगी।


3 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. यही तो है जिंदगी कही धूप और छाया और कभी ख़ुशी और गम.... चलते जाना

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  3. बहुत सुन्दर रचना है, शब्द और भाव का संयोजन सुन्दर लगा !

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आभार है मेरा

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