13 June 2014

बारिश

आज बारिश भिगा के चली गयी,
भूल चुकी थी जिस एहसास को,
उसे फिर से जगा के चली गयी। 

बरसों से छिपे आसूं क्षण भर में छलक पड़े,
सूख चुके थे जो पहले,
उन्हें रुला के चली गयी। 

मन की चंचलता इक कोने में दबी थी कहीं,
लाख रोका था मैंने लेकिन,
उसे उफ़ना के चली  गयी।

यादों के बादल बरस गए कुछ ऐसे,
सहेज के रखे थे जो पल,
उन पलों को बिखरा के चली गयी। 

आज बारिश भिगा के चली गयी। 







5 comments:

  1. bahut hi sundar prastuti barish ke bahane .....

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  2. dil ko chune waali prastuti..badhaai... www.sriramroy.blogspot.in

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  3. Nice ..its feeling like a my life storytelling...

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  4. बहुत जोरदारअभिव्यक्ति है

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आभार है मेरा

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