06 May 2013

वह

पोह फटने से पहले उठ जाती ,
करती ढेर सारा काम ,
पल भर  भी  जिसको नहीं आराम,
वह गाँव की औरत है।


कपडे धोती बर्तन धोती,
करती  सबकी देखभाल,
कैसे आये आराम का ख्याल,
वह गाँव की औरत है।
खेतीबाड़ी का काम भी करे वोह,
नहीं देखती अपना चैन,
उसको तो करना  काम दिन रैन ,
वह गाँव की औरत है।

पशुओं को भी देती प्यार,
करती है वोह कठोर परिश्रम,
जब तक है उसके दम में दम,
वह गाँव की औरत है।


2 comments:

  1. सचमुच कितने काम करती है गाँव की औरत. वास्तव में औरत ही बहुत काम करती है, गांव की भी और शहर की भी, काम का रूप थोड़ा अलग होता है.सुन्दर..!!!

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  2. हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं संजय भास्कर हार्दिक स्वागत करता हूँ.

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आभार है मेरा

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