09 April 2015

आज मैं नि:शब्द हूँ


आज मैं नि:शब्द हूँ
त्रस्त और स्तब्ध हूँ  

भिन्न भिन्न सवाल हैं

और कई बवाल हैं  

उठ  रहा तूफ़ान है 
गिर रहा मचान है  


क्यूँ दुःख हैं जीवन में ?
क्यूँ  सुख अनजान है ?

मोह माया से परास्त क्यूँ,
यह पूरा संसार है?

दे हमें मोक्ष तू ,
और मुक्ति की कामना  

कर हमारी दूर तू, 
यह सारी  यातना  

  
आज मैं नि:शब्द हूँ
त्रस्त और स्तब्ध हूँ 

6 comments:

  1. अब उसका ही आसरा है... बहुत सुन्दर रचना... शुभकामनाये

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  2. jin sawalon ke jawab nehi hote wohi hamaare aur iswar ke bich ki duri hai... sundar rachnaa..

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आभार है मेरा

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